साई सन्देश

 श्री सत्य साई सेवा संगठन मध्यप्रदेश
द्वारा प्रत्येक समिति एवं भजनमंडली में भजनों के उपरांत सभी भक्तों को सुनाये जाने हेतु
 

 श्री सत्य साईं सेवा संगठन मध्यप्रदेश
द्वारा प्रत्येक समिति एवं भजनमंडली में भजनों के उपरांत  सभी भक्तों को सुनाये जाने हेतु  

        एक साल के बाद दूसरा साल आता रहता हैं किन्तु मनुष्यो श्रेष्ठ विचारों को विकसित नहीं कर पाया हैं। एक सच्चा इन्सािन वह हैं जो अच्छे मन वाला हैं। अच्छेे मन की ये विशेषताऍ हैं कि इसमे सूरज का प्रकाश और चन्द्रतमा की शीतलता रहती हैं। यह व्ययक्ति को पवित्र बोल की शक्ति प्रदान करता हैं और समाज में शान्ति बनाऍ रखता हैं। सच्चा इन्सा न वह हैं जिसमें सौहार्द्र, दया, करूणा, प्रेम, सहिष्णुकता सहानुभूमि और त्याोग की भावना रहती हैं। लेकिन आधुनिक मानव मे ये पवित्र गुण दुर्लभ हो गए हैं। इन गुणों से हीन व्यहक्ति कैसे मनुष्य कहला सकता हैं।

        हर कोई यह कामना करता हैं कि नव वर्ष उसके जीवन में ढेरों खुशियॉं, शान्ति और समृद्धि ले आये। नववर्ष अपनें साथ खुशी या गम लेकर नहीं आता हैं। कल का दिन आज के दिन जैसा था और कल का दिन आज के दिन की तरह रहेंगा। दिन एक जैसे ही होते हैं लेकिन व्यरक्ति अपने कर्मो के अनुसार आनन्द या दु:ख का अनुभव करता हैं। पुण्यत कार्य करने पर दु:ख नहीं होता हैं और पाप कर्म करने से आनन्द का अनुभव नहीं होता हैं। व्यहक्ति को अपने कर्मो के फल को भोगना ही पड़ता हैं लेकिन व्य्क्ति जब भगवान की अनुकम्पा को प्राप्तम कर लेता हैं तो वह आनन्द और दु:ख दोनो को समभाव से ही देखने लगता हैं। भगवान की अनुकम्पात पापों के पहाडों को नष्ट कर शान्ति प्रदान करती हैं। लेकिन कलियुग के प्रभाव से मनुष्यम भगवान में विश्वा स खो बैठा हैं। वह धन दौलत और अधिकार के मोह मे फॅंसा हुआ है। मनुष्य‍ मानव से देव तभी बन सकता हैं जब वह मानवीय मूल्यों को आचरण में रखें ।
        अत: मनुष्या को मानवीय मूल्योंक को विकसित करना चाहिए । साथ पवित्र कार्यो में भी लगना चाहिए और इन सेवा कार्यो को और अधिक करते रहना चाहिए। दरअसल आनन्द तो तुम्हाएरे ही अन्दोर स्थित हैं और तुम्हालरे पवित्र भावों से उत्पिन्नन होता हैं। अत: तुम्हेंद अपने अन्दहर स्थित आनन्दर को प्रकट करना चाहिए इसे दूसरों द्वारा तुम्हेंन प्रदान नहीं किया जा सकता है कोई भी तुम्हापरे आनन्दथ को नहीं ले जा सकता हैं और तुम इसे कहीं बाहर से प्राप्तन नहीं कर सकते हों ।


भगवान श्री सत्य साई बाबा 

        आज से नये वर्ष का आगमन हो रहा हैं ऐसे कई नये वर्ष आये और गये हैं। मनुष्यन चाहता हैं कि नव वर्ष आये उसे और संसार को ढेर सारा आन्न द, शान्ति और समृद्धि प्रदान करें लेकिन संसार का कल्यारण मनुष्यम के आचरण एवं व्यऔवहार पर आधारित होता हैं। मनुष्यय का आचरण उसके मन पर आधारित होता हैं। मन का स्वधभाव विचारो पर आधारित होता हैं। जब मनुष्य के विचार सत्यै पर आधारित होंगे तब संसार उन्नति करेगा। मनुष्यष अपना और संसार का कल्यामण चाहता हैं तो उसे अपने विचार और कार्यो को अपनी आकांक्षाओ के अनुरूप ढालना चाहिए।
        अच्छा और बुरा, आनन्दअ और दु:ख, पाप और पुण्य‍ मनुष्य‍ के कार्यो पर ही निर्भर होते हैं। जैसा कार्य होगा वैसा ही फल होगा लेकिन आज मनुष्य कार्य के नियमो को भुला दे रहा हैं और जैसा मन में आया वैसा आचरण कर रहा हैं। पाप कार्यो को करना सरल हैं किन्तु उनके दुष्पसरिणामों को भोगना बहुत ही कठिन हैं। उपनिषदो का कहना हैं। ‘’तस्मैंो नम: कर्मणे’’ (कार्यो को नमस्काकर हैं) - तुम जिन कार्यो को करते हो उन्हें नमस्कानर करना चाहिए जिससे वे पवित्र बन जायेंगे। तुम्हें अच्छास नाम प्रदान करेंगे और संसार के कल्यािण में सहयोग प्रदान करेंगे। यह भारत की संस्‍कृति के प्राथमिक सिद्धान्तोय में से एक हैं। अनादि काल से भारतीय कार्यो को आदर प्रदान कर रहें हैं, चाहे कार्य बड़ा हो या छोटा । नर्तक/नर्तकी नृत्यत का प्रदर्शन करने के पहले अपने घुँघरूओं को प्रणाम करते हैं। तबला वादक भी तबला बजाने के पहले तबले को प्रणाम करते हैं। शिक्षित व्यकक्ति ही नहीं अपितु अशिक्षित लॉंरी चालक भी लॉरी चलाने से पहले स्टी यरींग व्हीयल पर माथा टेकते हैं। वह हमारी पवित्र संस्कृेति, जो कार्यो को महत्वह प्रदान करती हैं।
        तुम्हें किसी भी कार्य को करने के पहले अच्छेक बुरे का पता कर लेना चाहिए । ‘’जल्द बाजी में किया काम बरबाद हो जाता हैं और बरबादी से चिन्ताा होती हैं।’’ अत: कभी जल्दाबाजी मत करों। मनुष्यी को अपने किये कार्यो से ही आनन्दी या दु:ख का अनुभव होता हैं। मनुष्यद को अपने कार्यो का परिणाम अवश्य भोगना होता हैं। अत: उसे सद्कार्य ही करने चाहिए। तुम्हें उन्हीं कार्यो को करना चाहिए जिससे दूसरो को लाभ पहुँचे।

भगवान श्री सत्य साई बाबा 

        संक्रान्ति के त्योमहार के साथ ही बिना किसी कठिनाई के मनुष्य की भोजन की और भौतिक सभी आवश्ययकताएं पूरी हो जाएं ऐसी ईश्व र ने इच्छाि की थी। संक्रान्ति एक ऐसा पर्व हैं, जब खेतीहर किसान अपने घरों में सुख चैन से बैठ सकते हैं। वे मजदूर भी जिन्होयने दिन रात एक करके खेतों मे जी तोड़ मेहनत की हो उनको भी भगवान आनन्दा और विश्राम का पारितोषिक देते हैं। भगवान जो कुछ भी करते हैं, वह सब कुछ लोगो के लिए ही होता हैं, क्योंसकि सभी दिव्यक का अंश हैं। ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: अर्थात सभी प्राणियों में शाश्वात आत्माश मेरा ही अंश हैं, भगवद् गीता में भगवान श्री कृष्ण ऐसा कहते हैं। न केवल मनुष्यम बल्कि पशु पक्षी और जन्तुा भी दिव्यी स्वशरूप हैं। त्या गराज ने कहा हैं,
        हे राम तुम अपने अकलुषित और पवित्र प्रेम स्व रूप में चींटी से लेकर ब्रम्हत तक और शिवा तथा केशव में भी निवास करते हों । कृपानिधान मेरे भी रक्षक बनों। हालांकि इस सत्यश को सभी लोग समझ नहीं पाते हैं और अपनी गर्दन पर रेंगती चींटी को एकदम ही पकड़ कर मसल देते हैं और यदि वहीं चींटी ब्रम्हगरूप में उनके समक्ष आ जाए तो उसे नमन करते हैं। इस प्रकार से रूप के आधार पर वे भेदभाव करते हैं।
एक में अनेक में, मैं का सिद्धान्त सब में लागू होता हैं। केवल एक ही जाति हैं वह हैं मानवता की जाति। मानवता दिव्यत हैं, पवित्र हैं और अति मूल्यिवान हैं । मानव शब्द। ही पवित्रता दर्शाता हैं और संक्रान्ति का पर्व लोगो को इस सत्यव का भान करवाता हैं। एक सच्चा् हिन्दु कौन हैं ? HINDU शब्दय मे एच से बनती हैं ह्मयूमिलिटी अर्थात विनय, आई से इंडिविजुआलिटी अर्थात व्यदक्तित्व या आत्मादभिमान , एन से नेशनालिटी अर्थात रा‍ष्ट्री्यता, डी से डिवोशन अर्थात भक्ति तथा यू से युनिटी अर्थात एकत्वत । जहॉं एकत्वम होता है वहॉं दिव्येता होती हैं। दिव्यूता ही विश्वत की एकता का आधार हैं।
        मकर संक्रामण के इस पवित्र पुण्यहकाल में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता हैं, तब लोग गाने बजाने व नाचने का आनन्द उठाते हैं। यह पशुओं के लिए भी उत्स व हैं।
        संक्रान्ति पुशओं के साथ-साथ पक्षियों को भी आनन्द देती हैं । मंदिरो और मस्जिदो की उँची दिवारो पर झुण्डो में बैठे हुए पक्षी सभी धर्मो के लोगो को एकता की शिक्षा देते हैं। आज धर्म मे अनेको लोगो को विश्वाुस नहीं हैं वास्तीव में धर्म मनुष्य् के लिए महान आदर्श प्रस्तुीत करता हैं। हमारी संस्थाैओं में अनेको विद्यार्थी हैं । उनकें मध्यह में कोई भेदभाव नहीं हैं। जो धर्म के नाम पर भेदभाव करता हैं, उसे इन्सायन कैसे कह सकते हैं ॽ धर्म केवल एक हैं, वह हैं ‘’प्रेम का धर्म’’ जो प्रेम के धर्म का पालन करता हैं, वही सच्चेए अर्थो में मानव हैं। हमें सभी धर्मो की अच्छाआईयों को अपनाना चाहिए। कितना कुछ हैं, हमें सीखने के लिए पशु पक्षियों से और बाकी सभी प्राणियों से धर्म का अर्थ ही  ‘प्रेम’ हैं 
        मनुष्य को अपनी पवित्रता का स्म रण दिलाने के लिए ही संक्रान्ति का त्योकहार मनाया जाता हैं। संक्रान्ति हमें अच्छेी विचारों के लिए प्रेरित करती हैं। जो कुछ अच्छाम हम सीखे उसका अभ्याचस करना चाहिए ।

भगवान श्री सत्य साई बाबा 

        मानव जन्म पाना दुर्लभ है। तभी कहा जाता है, ‘’ जंतुनाम्‍ नर जन्मख दुर्लभम्‍’’ । बड़ा दुर्भाग्या है कि इस प्रकार के दुर्लभ और पावन मानव जन्मक को धन्य् करने और उसे उद्देश्यर पूर्ण बनाने का प्रयास न किया जावे। बुद्धि, जो कि ईश्वऔर की रचना में मानव का ही विशेषाधिकार है, मानव जीवन को शोभा प्रदान करती है। जैसे – जैसे बुद्धि का विकास होगा उसी अनुपात में मानवत्वप (मानवीय गुण) विकसित होगा।             

        जैसे- जैसे ज्ञान की वृद्धि होगी, मानव जीवन की गुणवत्ताव प्रस्फुजटित होगी। हम बांस की छडी का मूल्य उसकी लंबाई, मो‍टाई तथा मजबूती को देखते हुए निर्धारित करते है। गन्ने‍ का मूल्य उसके रस के अनुसार होता है। सांड का मूल्या उसके बल और सुंदरता के आधार पर होता है। इसी प्रकार मानव का मूल्या उसकी बुद्धि के आधार पर होता है। 

        मानव दैवत्वर की ओर जाने वाले कर्म, भक्ति और ज्ञान के तीन मिले जुले मार्ग का स्वैरूप है। इस प्रकार के त्रिमूर्त मानव का यह सर्वोच्चर कर्त्तलव्यग है कि वह कर्म द्वारा अपने जीवन को पावन बनाये, भक्ति द्वारा शांत निश्चकलता का विकास करे और ज्ञान रूपी लक्ष्यम को प्राप्तक करें। मानव, शरीर को पवित्र कर्म करने और समाज सेवा में लगायें। अपने शरीर को अपने सहचरों की सेवा में समर्पित करने को ही सही अर्थों में सत्करर्म कहा जाता है। इस मार्ग में अनेक ईर्ष्या लु और अस हिष्णुत लोग बधाऐं डालेंगे परंतु हमें इस प्रकार के बुरे विचारों के सामने झुकना नहीं चाहिए। ‘’ परोपकारार्थम्‍ इदं शरीरं ’’ (मानव शरीर दूसरों के उपकार के लिये ही मिला है।) सूत्र के अनुरूप मन में उठने वाले सद्विचारों को, अपने शरीर को समाज सेवा में समर्पित करते हुए निर्मल बनाना चाहिए।

भगवान श्री सत्य साई बाबा 

        ईश्वर ने पर्वत, नदियां, जंगल, वन, ऊँचे शिखर और गहरी खाईयॅा बनाई हैं उसी तरह जीव -जन्तु सभी छोटे बडे प्राणी बनाये और फिर ईश्वलर ने वो सारी वस्तुऍ बनाई जिनकी सृष्टि की इस रचना को सुचारू रूप से चलाने के लिये आवश्यऍकता थी। इस सुदंर प्रकृति की रचना करने के उपरांत भगवान ने सोचा की सृष्टि की इन छटाओं, बहती नदियों, भव्य पहाडो को, कडकती बिजली को, ठंडी बहती बयार को, सूरज की गर्मी और चंद्रमा की शीतलता को, उडते पंछियो और वन में विचरते पशुओं को देख-देख कर कौन आंनदित होगा ?
विधाता को लगा कि इतने दिव्य सौंदर्य को देखकर उसका आंनद भोगने वाला कोई होना ही चाहियें, तब फिर परमात्मा ने जीवात्मा की रचना करने का संकल्प किया। जीवात्मा के पास बुद्धि, चार्तुय और विवेक बुद्धि हैं। विवेक बुद्धि का उपयोग करते हुए वह क्या स्थाई हैं क्या अस्थाई यह जान सकता हैं। ईश्वार प्रदत्त वस्तुयओं का उपभोग करते हुए वह आनन्द का अनुभव कर सकता हैं। इस समस्त रचना का मानव जीव यदि न हो तो क्या मुल्य ?

        भगवान ने एक संकल्प लिया हैं कि मैं अपने आपको अनेको रूपों में सृजित करता हूँ। ‘‘एकोहम् बहुष्याम‘‘ अर्थात् एक से मैं अनेक बनाता हूँ और इस विचार को रूप देते हुए परमात्मा ने जीवात्मा का सृजन किया। जीवात्मा को विज्ञान (आत्म स्वरूप का ज्ञान), सुज्ञान (आध्यात्मिक ज्ञान) तथा प्रज्ञान (निरन्तर एकीकृत चेतना) की शक्ति दी और विवक बुद्धि की शक्ति से विभुषित किया, कि वह इस अद्भुत सृष्टि का भरपुर आनन्द भोग सके। जब मानव को परमात्मा के दर्शन हुए तब उसने घोषणा करते हुए संसार को कहा - मैनें उस परमतत्व को जान लिया है। उसके दर्शन कर लिये हैं। वह करोडों सूर्य के समान तेजोमय हैं और जो तमस यानि अज्ञान के अंधकार से परे है।

        लोगों ने जप, तप, ध्यान और अर्चना आदि के अभ्यास परमात्मा के दर्शन पाने हेतु अपनाऐ परंतु उन्हें प्रभु के दर्शन नहीं हुए और इन सबसे मनुष्य निराश हो गया। वास्तव में जप, तप, ध्यान और अर्चना से मनुष्य को आत्मिक आनंद इसलिये प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि उसे अपने शरीर के प्रति गहरी आसक्ति थी। तब उसने देह की आसक्ति के कारणों को ढूंढा और प्रकृति एवं परमेश्वउर के विषय में अनेकों सत्यों की खोज की और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मानव देह केवल एक माटी का पुतला है और दिव्यशक्ति इसे चलाती है। यह वह दिव्यशक्ति है, जो जीवात्मा को चलाती है, उससे विभिन्न कार्य करवाती है और आनंद का अनुभव भी देती है। इसलिये मैं तुम सब से कहता हूं ईश्वर से प्रेम करो क्योंकि देहासक्ति दुख का कारण होती है। ईश्वर हमें अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकालकर हमें हमारे कर्म, विचारों को शुद्धता देते हैं ताकि हम सत्य एवं ज्ञान के मार्ग पर चल सकें।

भगवान श्री सत्य साई बाबा 

इस सन्देश में व्यएक्ति, परिवार, समाज, देश और विश्व की जटिल समस्यासओं को हल करने की अद्भूत शक्ति हैं। प्रेम ईश्व र की एक अनमोल देन हैं जो हमारे दुखो को हरने, हमारी व्यवथा को कम करने और हमारे जीवन को आनंदमय बनाने के लिये एक अचूक साधन हैं। जब हम प्रेम को अपने जीवन मे उतारते हैं तो हम छोटी-छोटी बातों से विचलित नहीं होते, कई कटु बातों को हँस कर उड़ा देते हैं, बात का बतंगड नहीं बनने देते । प्रेम के प्रभाव से वैर, ईर्यार उ, अंहकार, क्रोध, स्वावर्थ वैमनस्यर आदि दुर्गुण कमजोर पड़ जाते हैं और हमारे ह्दय में करूणा, सद्भावना, सहानुभूति आदि सद्गुणों का प्रवेश होने लगता हैं। भौतिक और आध्या,त्मिक जीवन में प्रेम का योगदान अत्यं त महत्वहपूर्ण हैं। प्रेम ही हमें परिवार, समाज, देश और परामात्मा‍ से बांधता हैं। प्रेम के बिना भक्ति नहीं हो सकती। प्रेम के माध्याम से ही सम्पूार्ण विश्वप में शांति आ सकती हैं, युद्ध बंद हो सकते हैं, समाज में हिंसा और अपराध कम किये जा सकते हैं।

सेवा पूजा की परिणति हैं, पर सच्ची, सेवा के लिये प्रेम का होना जरूरी हैं, जो सेवा करता हैं, उसे अन्य किसी प्रकार की पूजा करने की जरूरत नहीं हैं। सेवा तो प्रेम – जनित होती हैं, सेवा कोई प्रतिदान नहीं मॉंगती, किसी तरह का मोल – भाव नहीं करती और सच्चीह सेवा अपने–पराये का भेद नहीं करती। स्वाकमी ने ‘’मानव- सेवा को माधव सेवा’’ कहा हैं। हमारा प्रेम – – ‘’भाव और सेवा भाव लिये हो’’, कुछ सीमित लोगो के लिये नहीं हों ।
सेवा, एक ऐसा सद्गुण हैं जो सेवा करने वाले को भी उतनी खुशी देता हैं जितना उन्हें जिनकी सेवा की जाती हैं को खुशी देता हैं। सेवा को मजदूरी या संपत्ति से नहीं आका जा सकता हैं, सेवा तो परमात्मास के निकट पहूँचने का एक सुगम साधन हैं। सेवा करने वाले का ह्दय अंहकार रहित हो जाता हैं, उसमें करूणा, त्याकग और नम्रता जैसे सद्गुण आ जाते हैं और उसकी अंतरात्माो को संतोष का कोष मिल जाता हैं।

सेवा प्रेम सहित होनी चाहिये, प्रेम रहित सेवा कर्तव्य परायणता हो सकती हैं, पर उसमें सच्चीत सेवा की मधुरता नहीं आ सकती । प्रेम के पथ पर चलने वाले का जीवन आनंदमय हो जाता हैं। उसका व्याक्तित्वप एक सु‍गन्धित पुष्पा के भांति होता हैं जो अपने परिवेश को भी सुगंध से भर देता हैं।
आइये हम ‘’सबसे प्रेम करो, सबकी सेवा करो’’ को अपने जीवन में उतारें और अपना जीवन संवारे।


भगवान श्री सत्ये साई बाबा 

        मानव कितना भाग्यिशाली है इसका वर्णन करना सम्भ्व नहीं हैं। ‘’जन्तू्नां नरजन्मि दुर्लभम्’’ , अर्थात सभी जीवधारियों में मानव जन्मप कठिनता से मिलता हैं। आज का मनुष्य’ मानवता को नहीं पहचानता हैं और इस संसार के भौतिक और परिवर्तनशील पदार्थो से भ्रमित हो जाता हैं।         
        तुम्हारा जीवन इच्छा्ओ और आकांक्षाओ से भरा हुआ हैं। तुम्हें अपने आप से यह पूछना होगा कि क्या् जीवन में पूर्णता को प्राप्तं करने के लिए तुम समुचित प्रयत्नो कर रहें होॽ सर्व प्रथम अपने ह्दय में टटोल कर अपनी भावनाओं और अपने विचारो पर ध्याहन दो क्या वे पवित्र, स्थिर व स्वा र्थ रहित हैं ॽ अथवा वे कामनाओं से भरे हैंॽ हमारी कामनाऍ ही हमारे जीवन यात्रा में एक भारी बोझ के समान हैं, ’’कम सामान अधिक आराम यात्रा होती सुखद’’ इसलिए धीरे-धीरे करके अपनी इच्छा ओं को कम करते जाओ। यदि हमारे पास सामान का भार कम होगा तो हमारे पास शान्ति अधिक होगी इसके विपरित आज का मानव अपनी इच्छााओ के बोझ बढाता जाता हैं। यहॉ पर हजारो लोग एकत्रित हुए हैं अनेको सिर यहॉं पर हैं परन्तु भाव सबका एक हैं । एकात्मा् सर्व भूतान्तिरात्मार अर्थात सभी प्राणियों में एक ही आत्माु का निवास हैं हमारी देह में हमारी आसक्ति होने के कारण ही जीवन में कठिनाइयॉं आती हैं।
       ‘’सबसे प्रेम करो सबकी सेवा करों’’ किसी को भी अपने से अलग मत समझो । ऐसा भाव विकसित करो कि वह और तुम एक हो। समस्त मानव समाज एक है। इस संसार में जो तुम देखते हो वह केवल प्रतिक्रिया, प्रतिबिम्बस और प्रतिध्वोनि उस सत्यर की हैं जो केवल एक हैं, जब तुम सत्य को समझ लोगो तब तुम्हें शान्ति मिल जायेगी। तभी तुम्हाकरा मन स्थिर हो जायेगा और एकत्रित होकर तुम अपने अध्यलयन और व्यीवसाय के काम में लग पाओंगे। इसलिए सर्वप्रथम अपने आप को समाज की सेवा में लगा दो। समाज क्याल हैंॽ समाज तुम्हाबरा अपना प्रतिबिम्ब हैं इसलिए अपने आप को समाज से अलग मत करो अपने आप को सदैव समाज की सेवा में संलग्नप रखो। भगवान ने तुम्हेअ दो हाथ किसलिए दिए हैं ॽ इसलिए नहीं कि कागज के उपर उल्टान सीधा लिखते रहो । वे दो हाथ सदैव ईश्वलर की सेवा के कामों में लगे रहने चाहिए। काम ही पूजा हैं कर्तव्यब ईश्वइर है अपना कर्तव्यव करों।



भगवान श्री सत्य साई बाबा 

        मनुष्य पूर्णता को प्राप्त करने की हर सम्भव कोशिश कर रहा यह दक्षता संस्कृति की मदद से हासिल की जा सकती हैं। अपने में पावनता , सच्चकरित्रता और सुसंस्कृ ति लाने के लिए उसको निरतरं पावन कार्यो में लगे रहना चाहिये इसकें लिये अपने में प्रेम भावना को जगाओ वास्ताव मे प्रेम ही जीवन का तत्व है इस जीवन को प्रेम से परिपूरित कर लो प्रेम भगवान है । प्रेम में बने रहों लेकिन मनुष्यवजीवन के ऐसे तत्व की सरासर अनदेखी कर रहा है। उसके बजाय वह घृणा, ईष्या, दिखावा सरीखी बुरी आदतो को पाल रहा हैं, जिससे उसका जीवन निरर्थक हो जाता हैं।

सुनो इस सत्य को ऐ बहादुर सपुतो  भारत के।
राष्ट्र सम्मान करता निर्भर नैतिकता पर उसकी जनता के
नैतिकता की कमी ले जाती राष्ट्र को पतन की ओर
नैतिकता पर दृढ़ रहे जो है सच्चा मानव वही। 

दैवत्व प्राप्ति का तरिका -
       नैतिकता मनुष्य जीवन का सार हैं वही तत्व इंसानी जिन्दगी से गायब होता चला जा रहा हैं। वह नहीं समझता हैं कि नैतिकता के बगैर उसको मानव नहीं कहा जा सकता हैं । अपने दिल में नैतिकता का दीप प्रज्लि म त करो तभी जाकर तुम सही अर्थ में इंसानी जीवन बिता पाओगे इसके साथ ही नैतिकता भले स्वांस्य्बि की कुंजी भी हैं इसलिये मनुष्यं को नैतिकता को अपने जीवन का आधार समझना चाहिये । उसे भलीभॉति समझ लेना हैं कि मनुष्य जीवन नैतिकता पर चलने के लिए ही बना हैं।         
       इस गलत ख्याल में न रहो की पंचभूमतो से बनी देह ही मनुष्यं जीवन हैं वह तो नाशवान और क्षणिक हैं इसलिये उसके प्रति जरूरत से ज्या‍दा सही नहीं हैं। इस भौतिक शरीर के साथ ही मनुष्यउ को मन(मनस) बुद्धि और संस्कार (जन्मजात प्रवृत्तियॉं) मिली हैं। इन तीनो की उतपत्ति आत्मा से होती हैं इसी आधार पर गीता की उक्ति हैं- मामैवांशो जीवलोके जीवभूत सनातना’’(सभी प्राणियों में सनातन आत्मा मेरा ही अंश हैं।)
मन आत्माव का ही एक पहलू हैं । इसलिए मन को केवल इच्छा ओ का समुह न समझो बेशक सांसरिक नजरिये से यह इच्छाओ का समुह हो सकता हैं। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि कोण से यह देवत्व से भरपुर हैं। मनुष्य देवत्व‍ को कैसे प्राप्त कर सकता है? सबसे पहले उसमें एकता की भावना होनी चाहिये । ऐसी भावना ही उच्च संस्कृ‍ति की निशानी हैं । मनुष्य को एकता को अपना आर्दश बनाना हैं और सदैव उस पर टिके रहने का प्रयत्न करना चाहिये इस भावना के रहते मनुष्यि बडे से बडा कोई भी काम आसानी से कर सकता हैं। वैसे इंसान को आजादी तो मिल गई हैं। पंरतु अभी तक वह आपसी एकता स्थापित नहीं कर पाया है।
       मनुष्य को भिन्नता में भी एकता देखनी चाहिये । तभी जाकर वह देवत्व का बोध कर सकेगा । क्योंकि एकता से पावनता से आती हैं और पावनता से दैवत्व।ता का एहसास कराती हैं। जहॉं पावनता होगी वहॉं दैवत्व मौजुद होगा । एकता पवित्रता और दैवत्व। के आधार पर ही तुम्हे् आंदन की प्राप्ति हो सकती हैं।जब तक तुममें भिन्नतता की भावना हैं। और एकता नहीं हैं।तुम कदापि आंनद नहीं पा सकें ।
आनंद भगवान से मिलता हैं साधारण व्यंक्ति सोचता हैं कि धन संपत्ति और उच्च सत्ता मिल जाने पर वह सुखी रहेगा यह उसकी गलत धारणा हैं ।
      आज तुम एक भले काम का बीज बोओगें तो कल संस्कार के रूप में उसकी फसल काटोगे ।संस्कार से पावनता आती हैं , जिससे पुण्य मिलता हैं, वही तुम्हारा सौभाग्य है। व्यक्ति को सदैव भले कार्यो में लगे रहना चाहिये वास्तव में तभी उसे सच्चे आंनद की प्राप्ति होती है।

भगवान श्री सत्य साई बाबा 

     

    ‘’जब सूरज सिर पर होता हैं, तब परछाई नहीं पड़ती हैं। वैसे ही जब विश्वाेस दृढ़ होता हैं, तब उसमें संदेह की परछाई नहीं पड़ती हैं।‘’
    
दिव्यात्मा स्वंरूपों ! अपने कर्तव्य कर्म करने में ही स्वयं को समर्पित कर दो। व्य्र्थ की बातों में, और दूसरों की निंदा करने में ही अपना अति मूल्यमवान समय नष्ट‍ मत करों। निजी जीवन के कर्त्तरव्यद कर्म को निभाओ व साथ में आगे बढ़ते हुए परमात्मार के साथ ऐक्य् का तादात्य्ने प्राप्त करने के लक्ष्यक पर अपना ध्या न केन्द्रित करो। शिवरात्रि‍ का महान पर्व एक अति पावन अवसर हमें अपनी संस्कृयति ने दिया हैं, इससे लाभ उठाते हुए हम परमात्माम पर अपने अति चंचल मन मर्कट को स्थिर करने का भागीरथ प्रयत्नस कर सकते हैं। इतना कर पाना भी हमारे जीवन की एक उपलब्धि होगी। अन्य‍ सारे सांसारिक विचारों और चिंताओ को अपने से दूर हटाकर केवल एक रात्रि पूरी तरह से ईश्वचर आराधना को समर्पित कर दें।
प्रत्येईक जीवात्मार आनन्द पाना चाहता हैं। वह चाहता हैं कि उसका जीवन आनन्दय से भरपुर रहें। फिर चाहे वह कोई विद्वान पंडित हो या कलाकार, शक्तिशाली और सत्तारधारी हो या कोई प्रतिष्ठित नागरिक हो, प्रत्येकक आनन्दशमय, कृपामय, सुखमय जीवन बिताने की कामना करता हैं। प्रत्येदक व्य्क्ति प्रात:काल से सायंकाल तक सुख भोगने के सपने देखता हैं।
इस भौतिक संसार के जड़ पदार्थो को ही वास्तयविकता मानकर आज का संसारी जीव, भौतिक वस्तु ओं को पाने की होड़ में उनके पीछे मारा मारा फिरता हैं, परन्तुत यदि कोई इन भौतिक पदार्थो की सच्चाउई को जानने का प्रयत्नै करें । तो यह बात स्प ष्ट् हो जाएगी कि इनमें कोई सच्चा्ई नहीं होती हैं। ये नाशवान हैं, क्षण भंगुर हैं और केवल भौतिक सतह पर हैं। इनमें स्था यित्वर नहीं हैं। इनसे चिरस्थाैयी आनन्दप प्राप्तथ नहीं होता हैं। चिर कालिक, आलौकिक आनन्दथ का अनुभव करने के लिए व्यिक्ति को आवश्यदक प्रयत्ना करना पड़ेगा ।

आनन्द की खोज
सत् + चित्त + आनन्द् की उपस्थिति सारे ब्रम्हाण्ड् में हैं। सत् + चित्त + आनन्द का वास्तविक अर्थ समझने का सबको पूरा प्रयत्न् करना चाहिए और उसके पश्चात ही वह अपनी आत्मा की सच्ची पहचान कर सकता हैं। इस रहस्यमय संसार को विचित्र घटना‍ओं से प्रभावित और भ्रमित होकर मानव सत् + चित्त + आनन्द की स्थिति को अपने से भिन्न मानता हैं। अपनी देह में अतिशय आसक्ति होने के फलस्व्रूप व्यक्ति सच्चिदानंद स्वरूप में अंतर देखता हैं। प्रत्येक जीवात्मा को यह जानने का प्रयत्न करना चाहिए कि ‘’ मैं कौन हूँ ? जब ऐसी खोज का उत्तर जीवात्मा को मिल जाएगा तब उसे सत् + चित्त् + आनन्द को समझने की भी आवश्यकता नहीं रहेगी। जब तक मानव अपने आपको, इस नाशवान शरीर के साथ जोड़कर रखता हैं और अपने शारीरिक लक्षणों अथवा विशेषताओं में आसक्ति और स्वामित्व का अनुभव करता हैं, अनुराग करता हैं, तब तक वह सत् + चित्त + आनन्द की खोज ही करता रहता हैं। जिस दिन, जिस पल मनुष्य में यह जागरूकता आ जाती हैं कि उसकी वास्तविक प्रकृति ‘मैं’ हैं उसी पल वह दूसरी वस्तुओं के पीछे भागना छोड़ देता हैं। यह परम चैतयन्य उस पर प्रकट हो जाता हैं कि वही सत् + चित्त + आनन्द का स्वरूप है।



प्रभु से एकाकार का लक्ष्य 
इस तथ्य से यह प्रमाणित हो जाता हैं कि मानव को मानवता का उपहार देकर मृत्यु लोक में भेजा गया हैं और इसमें और उपर उठकर वह अपनें दिव्यता के लक्ष्य की और आगे बढ़े और ऐसा धन्य और उच्च जन्म पाने के पश्चात भी अति साधारण, ऐसे विविध शारीरिक सुखो के दलदल में लोटता रहे साथ ही ऐसी देहासक्ति के कारण अनेकों, कष्टक झेलता रहे यह उसे शोभा नहीं देता हैं। इनसे उपर उठ कर वह पशु–पक्षियों और अनेकों जीवो के निम्न स्तंर से उपर उठ जायेगा और मानव योनि की श्रेष्ठता को सिद्ध करेगा ।

महादेव शंकर की शिवरात्रि के अवसर पर व्रत रखकर भोजन तथा स्वाद पर नियंत्रण और रात्रि जागरण के द्वारा सुख के संयोग से वियोग की स्थिति प्राप्त होती है परन्तु आधुनिक जगत में ये अभ्यास एक नए रूप में भिन्न रूप में भोग विलास का साधन बन गया हैं रात्रि जागरण से जीवात्मा निरतंर परमात्मा का चिंतन–ध्या्न करके, साथ ही संयमित व सात्विक भोजन के आहार की निर्दोष शक्ति के प्रभाव से दिव्य्ता की दिशा में आगे बढ़ सकता हैं ईश्व र की कृपा अवश्य ही भक्ता की ऐसी तपस्या के परिणाम स्वरूप प्राप्त होती हैं। परन्तु इसके लिए प्रत्ये्क साधक हो स्वयं ही अपना आत्म‍ विश्लेषण करना चाहिए कि उसने किस भाव के साथ अपनी पूजा –अर्चना के अनुष्ठान को पूरा किया हैं। केवल मात्र सच्चीश्रद्धा और विश्वाास के माध्यम से ही दिव्य के साक्षात्कार का अवसर आता हैं दिव्याता हमारे सबके अन्दर ही है। एक बार जब मनुष्य को यह सत्य पहचान में आ जायेगा तो फिर वह कभी भी बुरे गुणों को अपने पास भी नहीं आने देगा। 

भगवान श्री सत्य साई बाबा 

‘’मनुष्य के हर एक काम का परिणाम होता हैं, जैसा काम वैसा उसका परिणाम । जैसा बीज वैसा ही उसका फल । कहते हैं न कि जैसा करोगे वैसा भरोगे । अतएव सद्कर्मो के अच्छेउ बीज बोओ और ईशकृपा के मीठे फल चखो।‘’     
        लोग पुण्यककार्य के फल पाना चाहते हैं, परन्तु पुण्यकार्य करना नहीं चाहते हैं। वे पापकार्य करते हैं, किन्तु उसका फल भोगना नहीं चाहते हैं, मानो वह पाप किसी ओर ने किया हो ।
        यह मनुष्यक का अज्ञान है कि वह बुरा काम करके भी उसे बुरा नहीं समझता हैं, इसलिए उसका बुरा परिणाम नहीं भोगना चाहता हैं। आज की परिस्थितियों के प्रभाव से भी ऐसा होता हैं। जब लोगो से दुख-दर्द और मुश्किलें सहन नहीं होती हैं, तब वे विलाप करने लगते हैं ‘’ हे भगवान तुम मुझे क्यों ऐसा कष्ट दे रहे हो? परन्तु भगवान इसके लिये जिम्मेेदार नहीं हैं। तुम स्वयं अपने सुख और दुख के लिए जिम्मे दार होते हो। भगवान केवल सनातन साक्षी हैं वह एक डाकिए की तरह से है जो घर-घर जाकर उनके लिफाफे, पैसे, पोस्टनकोर्ड उनको थमा देता हैं । चिट्ठी में सुखदायी संदेश आया हैं या दुखदायी संदेश आया हैं, उसमें डाकिए की कोई जिम्मेिवारी नहीं हैं। जैसा संदेश तुम्हा रे लिए आया होगा उसके अनुसार ही सुख या दुख का अनुभव तुम्हें करना पड़ेगा। अत: अच्छाा या बुरा हमें भगवान नहीं देते हैं, वह हमारे कर्मो का फल होता हैं, जो हमें मिलता हैं। हमारे इस जन्मा में और हमारे पिछले जन्मोंउ में किये गये अच्छेु कार्यो का लेखा – जोखा भगवान के पास रहता हैं, जिसमें आधार पर वे अपनी कृपा वर्षा करते हैं।
       इस भौतिक जगत मे कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता हैं एक छोटा सा रूमाल भी यदि खरीदना हो तो बाजार में जाकर दुकानदार को रूमाल का मूल्य चुकाना पडता हैं। वैसे ही प्रभु की कृपा पाने के लिए हमें ईश्वार को कुछ अर्पण करना चाहिए और हमारी छोटी – सी भेंट के बदले में भगवान हमें कई गुना फल देते हैं। सुदामा ने कृष्णर को एक मुठ्ठी भर तांदुल भेंट किए थे और बदले में भगवान ने उन्हें अपार धन संपत्ति दिये । कृष्णठ को उनके वजन के बराबर स्वेर्ण में तोलने का सत्यदभामा में बहुत प्रयत्नक किया, किन्तुं उसे उसमें सफलता नहीं मिली। परन्तुे पूर्ण भक्तिभाव के साथ रूक्मिणी का अर्पण किया हुआ एक तुलसी दल ही कृष्णे की तुलना में भारी बन गया। तुलसी का एक पत्ताु किस बात का संकेत देता हैं? सत्वण गुण, रजोगुण और तमोगुण से बनी हुई यह मानव देह एक पत्तेक के समान होती हैं। पुष्पक किस बात का संकेत देता हैं ? दिव्याता की सुगंध से भरा हुआ एक निर्मल ह्दय ही एक फूल के समान होता हैं। उसी प्रकार से एक फल मनुष्यग के मन का प्रतीक होता है। जो मीठे रस से भरा होता हैं, परन्तु मन उसके आस्वादन(स्वाद) से अनजान होता हैं। ठीक वैसे ही जैसे एक पेड़ अपने उपर पके हुए फल के स्वामद से अनजान होता हैं और किसी बेल को अपनी डालों पर खिले हुए पुष्पोु के मीठे मधु का स्वााद मालूम नहीं होता हैं ।
     रूक्मणी के द्वारा भक्तिभाव के साथ और बिना किसी बदले की आशा के भेंट किया हुआ तुलसी का एक पत्ताा ही विश्वविधाता की कृपा पाने के लिए पर्याप्त‍ था । विधि के नियम अनुसार कोई भी अपने कर्मो के फल से बच नहीं सकता हैं। जैसा तुम्हारा कर्म होगा वैसा ही उसका परिणाम होगा । भगवत् कृपा ही तुम्हारे कर्म के फल से रक्षा कर सकती हैं। 

भगवान श्री सत्य साई बाबा 

''जो नि:स्वार्थ भाव से उदारतापूर्वक सेवा करते हैं, वे विनम्रता से भाव विह्वल हो जाते हैं तथा उनका ह्दय शुद्ध हो जाता हैं।''         
         भगवान बाबा कहते हैं- ‘’तुम्हें यह मानना चाहिये की जीवन का मुख्ये उद्देश्या नि:स्वावर्थ सेवा के लिये है न कि स्वादन्तह: सुखाय के लिये। दूसरो की सेवा करना जीवन की सार्थकता शरीर, मन तथा आत्मा‍ की एकात्मा एवं समन्वेय में ही हैं। नि:स्वाकर्थ सेवा हेतु यह एकता अतिमहत्व,पूर्ण हैं जिसे केवल कर्मयोग से ही प्राप्त किया जा सकता हैं अर्थात नि:स्वासर्थ सेवा ही कर्मयोग हैं। जो नि:स्वा्र्थ भाव से समाज की सेवा करते हैं समाज मे उन्हीस का सम्माहन होता हैं और वे ही प्रतिष्ठाे के सच्चे् पात्र हैं। ईश्वकर का अनुग्रह भी ऐसे ही व्यकक्तियों को प्राप्तय होता हैं सभी को नि:स्वा‍र्थ सेवा के इस सत्यश को स्वीगकार करना ही होगा।
नि:स्वातर्थ सेवा तभी की जा सकती हैं जब ऐसा करते समय त्यातग की भावना हो। ऐसी सेवा ही नि:स्वातर्थ सेवा कहा जा सकता हैं जो वास्ताविक अर्थो में परमेश्वगर के प्रति समर्पित हो । नि:स्वातर्थ सेवा ही जीवन का मूल मंत्र हैं।
        समस्त मानवता के प्रति त्यागमय नि:स्वारर्थ सेवा ही हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य हैं। प्रत्येक व्य्क्ति, चाहे वह कितना भी महान या बड़ा क्यों न हो उसे यह निश्चित रूप से मानना पडेगा कि नि:स्वािर्थ सेवा ही जीवन हैं। माता हो या शिशु, गुरू हो या विद्यार्थी, ईश्व‍र हो या भक्तक, सभी एक दूसरे के पूरक हैं। यदि माता न हो तो शिशु शब्दश का अर्थ ही नहीं रह जाता उसी प्रकार यदि शिशु न हो तो ‘’माँ’’ शब्द का आश्य ही कल्पना से परे है उसी प्रकार भक्त के बिना ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं और ईश्वर के बिना भक्त् का कोई अस्तित्व नहीं । सभी को इस अटूट संबंध को मानना ही होगा। आप स्वंयं को, उन व्यक्तियों में बदल लो जो दूसरो की सेवा करते हैं न कि दूसरो से सेवा की अपेक्षा रखते हैं।     
        जो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से आपसे बहुत अच्छि स्थिती में हैं उन लोगो की सेवा करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसे व्येक्ति जिन्हें लक्ष्मी नारायण कहा जा सकता हैं, वे कितने भी नौकर अपने यहां रख सकते हैं और आपकी सेवा के बिना उनका कोई काम नहीं रूकता । उसी प्रकार आपके समकक्ष व्यजक्ति जिन्हेंक अश्वईत्थस नारायण कहा जा सकता हैं, उन्हेंक भी आपकी सेवा की उतनी आवश्यजकता नहीं हैं। आप उनकी कितनी भी सेवा करें, उनको संतोष नहीं होगा ।
       आपको तो उन्हीं की नि:स्वाहर्थ सेवा करनी है जो निराश्रित, अभावग्रस्त एवं अनाथ हैं। इन व्यक्तियों की सेवा करते समय आपके मन मे यही भावना आनी चाहिये कि आप वास्तविक रूप से नारायण की सेवा कर रहे हैं। ऐसी भावना से ओत - प्रोत होकर जो कर्मणा वाचा से सेवा करते हैं उनके ही जीवन में विनम्रता आती हैं एवं पवित्र विचार प्रवाहित होते हैं । सेवा करते समय किसी भी प्रकार का दिखावा या आडंबर नही होना चाहिये । विशाल ह्दय से इस सेवा मे वास्तविक प्रेम एवं स्नेाह का ही अनुभव करें । सक्रिय कार्यकर्ता ही इस संगठन के आधार स्तंभ हैं।
         द्वैत भावना ही मनुष्यन के जीवन के दुखो का कारण हैं। यदि आप अपने जीवन को पवित्र करना चाहते हैं तो मस्तिष्कआ पर पडे गलत अनुभवों की धूल को नि:स्वाकर्थ सेवा से स्वकच्छा करते हुए, जीवन के उद्देश्य का लक्ष्यन प्राप्ति कर सकते हैं। अर्थात सेवा के लिये मन की शुद्धता आवश्यएक हैं।
       मानव एक बहुत बडी शक्ति हैं। उसका वर्णन आसानी से नहीं किया जा सकता । प्रत्य्क्ष में हम मानव की सेवा करते हैं। परन्तुा इससे ईश्वंर की ही सेवा होती हैं अर्थात ‘’मानव सेवा ही माधव सेवा हैं’’
     हमें पारिवारिक बंधुत्वै की भावना से विश्याईश्वपी आत्मा की परिधि तक जीवन यात्रा तय करनी हैं। यह शरीर जो एक ‘’अन्नेमय’’ हैं, इसकी यात्रा को ‘’विज्ञानमया’’की बैसाखी पर चलाते हुए। ‘’ आनन्दमया’’ के लक्ष्य तक पहुंचना हैं। वह व्यक्ति जो नि:स्वाार्थ सेवा नहीं करता दुनिया की तुच्छ्तम वस्तु’ से भी हीन हैं। सेवा ही जीवन है और सेवा ही जीवन का लक्ष्य। इन्ही भावनाओं से पूर्ण रूपेण समर्पित होकर जीवन के इस महान लक्ष्य के प्र‍ति मनुष्य को समर्पित हो जाना चाहिये। एक आदर्श कार्यकर्ता बनिये एवं एक आदर्श नागरिक बनें । 

भगवान श्री सत्य साई बाबा 

       व्यक्ति समष्टि का अंग हैं, समष्टि सृष्टि का एक हिस्सा हैं, जो परमेष्टी में से उत्पन्न हुई हैं। इस कारण से सृष्टि में बने समाज की बिना किसी स्वार्थ के पवित्र सेवा करना प्रत्येंक का कर्त्तमव्य बनता हैं। ऐसे व्यक्तियों से मिलकर ही सच्चा समाज बनता हैं। व्यंक्ति का प्रत्ये‍क कार्य समाज सेवा के प्रयोजन से ही होना चाहिए सभी इसी समाज के सदस्य हैं। हालांकि व्यक्ति व्यक्ति से भिन्न हैं, परन्तु सबके अंदर एक समान ही ह्दय है। अर्थात सत्य एक है। परन्तु विद्वान उसे अलग-अलग नाम से पुकारते हैं। एकात्मा सर्व भूतान्ततर आत्मा- अर्थात एक ही आत्मा सभी जीवों में वास करती है।
        यह कोरा कागज है, इसमें यदि सब्जियाँ बांधोगे तो उसमें उनकी गंध फैल जायेगी, यदि केले आदि फल लपेटोगे तो उनकी गंध फैल जायेगी, यदि उसमें सूखी मछली बांधोगे तो कागज में मछली की बास आयेगी कागज की अपनी गंध नहीं होती हैं, जिस वस्तुी को उसमें रखा जाए उसकी गंध तो वह अपने मे समा लेता हैं मनुष्यो सहज रूप से निर्मल और पवित्र होता हैं, परन्तु बुरी संगत में पड़कर वह बुरी आदतें अपना लेता हैं। बताओ तुम्हाारे साथी कौन है और मैं बता दूंगा तुम कैसे हो। कैसे लोगो की संगत में तुम रहते हो यह बताओ तो तुम किस प्रकार के इन्सादन हो यह बताओ तो तुम किस प्रकार के इन्सा न हो यह मै बता सकता हूँ । इसलिए अपने सभी प्रकार के कामों मे अच्छेा लोगों की संगत में ही रहना परम आवश्यबक हैं। तुम्हाअरा साथ ही अच्छा् या बुरा बनाता हैं। इसलिए बुरे लोगो की संगत से बच कर रहों। जिनकें ह्दय निर्मल हों और भावनाएं पवित्र हों ऐसे लोगो का साथ बनाओं । हम मनुष्यग समाज का अंग है और आज जो बुराईयाँ समाज में फैली हुई हैं, वे एक-एक व्यरक्ति की निजी बुराईयों के परिणाम स्व‍रूप हैं। उसी प्रकार से समाज की बुराईयों का प्रभाव व्य,क्ति पर पड़ता हैं। सम्पूकर्ण सृष्टि दिव्यब हैं । सभी प्राकृतिक रूप से पावन हैं । परन्तुप वातावरण से प्रभावित होकर आचरण बदल सकता हैं ।
        हम जैसा मार्ग अपनाऐं उसी प्रकार का अनुभव हमें मिलेगा। इसलिए हमे अच्छेस लोगो का साथ करना चाहिए हमें अच्छा नाम कमाना चाहिए और अच्छाि जीवन बिताना चाहिए । अपने ह्दयों को शुद्ध पवित्र भावों से भर लो, भगवान बुद्ध का ह्दय ऐसे ही भावो से भरा हुआ था। बुद्ध का ह्दय ऐसे ही भावो से भरा हुआ था। बुद्ध ने घोषणा की धर्मम् शरणम् गच्छाभमि, मैं धर्म की शरण मे जाता हुँ, सत्युम् शरणम् गच्छाीमि, मैं सत्यर की शरण में जाता हुँ । हमारी सभी गतिवि‍धियों (कामों) का आधार सत्य‍ धर्म ही होना चाहिए । यदि हमारा आमना सामना बुरे लोगों से हो जाये तो भी हमें उनकी अच्छारईयों को ही ध्या न में रखना चाहिए। सभी के अन्देर उसी प्रभु का निवास है। भगवान को लोग अल्लाचह, जीसस, राम, कृष्णे, महावीर, नानक जैसे अनेकों नाम देते हैं, परन्तुव ईश्वर एक है। अलग-अलग नामों से भगवान में कोई भेद मत करो ।

     ऐसे ही नाम और रूप अलग-अलग होने पर भी आत्माअ सबमें समान हैं। राम या कृष्णग इन नामों के साथ नहीं जन्मेंअ थें। उनके माता – पिता ने उनको ये नाम दिये थे भगवान किसी नाम के साथ जन्मा नहीं लेते हैं। वे निर्गुण, निरजंन, सनातन, निकेतन , नित्य , शुद्ध, बुद्ध मुक्तइ और निर्मल स्वमरूप वाले हैं।

    भगवान तो प्रेम – स्वरूप, सत्य -स्वरूप हैं सत्य ईश्वर है। प्रेम ईश्वेर है।प्रेम में जियो। अपने ह्दय को प्रेम से भर लो, तथा प्रेम पूर्ण जीवन बिताओं। सबसे प्रेम करों, क्योंकि भगवान सभी में प्रेम रूप मे मौजूद हैं। इस संसार मे प्रेम रहित कोई भी नहीं हैं प्रेम के कई रूपों मे ऐसा लग सकता है। परन्तु वास्तव में प्रेम एक है।
मानव जीवन के वास्तविक गुणो की परख उन्हें भलीभांति होनी चाहिये । जीवन में सुख-दुख एवं इच्छा - अनिच्छाख यह सब आपके मस्तिष्को की ही उपज हैं वास्तव में हमे ईश्वर के अस्तित्व को नि:स्वा‍र्थ सेवा के माध्यम से देखना या समझना चाहिये। हमारे पास ईश्वरीय प्रेम हैं अतएव हमें चाहिये कि वर्तमान की सबसे अंह एवं अत्यंत आवश्य्क तथ्य जो केवल नि:स्वार्थ सेवा ही है – को भलीभांति समझे हमें अपने मस्तिष्क से स्वा्र्थ की भावना को हमेशा के लिये निकाल देना होगा। सेवा का सबसे अच्छा पक्ष यही हैं कि जीवन में शांति पाने के लिये सेवा की अपेक्षा और कोई अच्छी सवारी नहीं हो सकती । 

भगवान श्री सत्य साई बाबा 

नया साल शुरू होता है तो लोगों की जिज्ञासा होती है यह जानने की, कि नववर्ष उनके खुद के लिए तथा सारे संसार के लिए कैसा रहेगा ? परंतु संसार का भविष्य नए साल के बजाय मनुष्य के अपने कर्मों पर ही निर्भर करता है । दूसरी ओर कार्य मन पर निर्भर करते हैं, तो मन विचारों पर । जैसे विचार, वैसे कार्य । इसलिए विश्व में शांति और खुशहाली के लिए इंसान को अपने में भले व सच्चे विचारों को बढ़ावा देना चाहिए । मनुष्य के ऐसे विचारों के आधार पर ही संसार में शांति और सुरक्षा रह सकती है । 

'कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके' अर्थात मानव समाज कर्मों से बंधा होता है । सृष्टि, पोषण और विलय सभी के लिए कर्म ही जिम्मेदार होते हैं । पाप-पुण्य तथा सुख-दुख भी कर्मों के आधार पर ही होते हैं । यह सत्य है, लेकिन इंसान इस सत्य को नहीं समझता है और अपनी सनक व मन-मर्जी पर ही चलता रहता है । फलतः वह जान-बूझकर बुरे काम करता है, जिनके करने से उसे भला लगता है । परंतु उसे जरा भी पता नहीं होता है कि इनके कारण ही उसे घोर संकटों का सामना करना पड़ेगा । व्यक्ति के कर्म चाहे भले हों या बुरे, छोटे हों या बड़े - सभी के फल उसे ही भुगतने हैं । मनुष्य को इस सत्य का ज्ञान बहुत जरूरी है, जिससे वह अपने कर्मों को सही रख सके । किसी काम को शुरू करने से पहले उसके भले-बुरे या सही-गलत होने के बारे में भली-भांति जान लो । जल्दबाजी कभी न
करो । जल्दबाजी से बर्बादी होती है, जिससे परेशानी होने लगती है इसलिए कभी हड़बड़ी में न रहो । उपनिषदों की शिक्षा है : 'तस्मै नमः कर्मणे', अर्थात व्यक्ति को कोई काम शुरू करने से पहले, उसको प्रणाम करना चाहिए । साथ ही कर्म के देवता को भी नमस्कार करना चाहिए । इससे तुम्हारे सभी काम पवित्र होंगे और यही सब के लिए
लाभकर भी है । यह भारतीय संस्कृति का एक खास सिद्धांत है । उदाहरण के लिए हम नृत्य करने वालों को नृत्य शुरू करने से पहले पायलों की पूजा करते पाते हैं । उसके बाद ही वे उनको पावों पर बांधते हैं । उसी तरह वाद्य संगीतज्ञ गायन प्रारंभ करने से पूर्व अपने वाद्य यंत्रों की पूजा करते हैं । इसका तात्पर्य हुआ कि आदमी जिस काम को करता है, उसका सम्मान करे तथा उसे इस ढंग से करे कि उसके खुद के जीवन में पावनता आए । मन का नहीं दिल का अनुसरण करो । 

आने वाले नए साल में क्या होगा ? इस पर सोच विचार कर अपने समय और शक्ति को बेकार ना करो । तुम्हारे काम भले होंगे तो भविष्य अवश्य ही उज्जवल होगा । सारे राष्ट्र का भविष्य तुम्हारे कार्यों पर निर्भर करता है । भगवान तो सिर्फ साक्षी होते हैं । वह न तो तुम्हारी रक्षा करते हैं और न ही दंड देते हैं । असल में अपने संरक्षण और दंड देने वाले दोनों तुम ही हो । तुम भला-बुरा जो कुछ कहते हो, भगवान सदा तथास्तु ही कहते हैं । प्रभु सभी को आशीष देते हैं । अपने सुख-दुख दोनों के लिए व्यक्ति खुद ही जिम्मेदार होता है । मन के पीछे न पड़ो । उसका कहा मानने से तुम सांसारिकता के दलदल में फंस जाओगे । इसके बजाय दिल का अनुसरण करो । मन का कहा मानने से तुम्हें कई संकट झेलने पढ़ेंगे। ऐसा करने से तुम अपना सिर ही गँवा बैठोगे । इसलिए अपनी दृष्टि अंदर की ओर करो और हृदय का अनुसरण करो । वह सत्य, धर्म, शांति, प्रेम, अहिंसा सरीखे गुणों सद्गुणों का स्रोत है । इस कक्ष में कई बल्ब प्रकाश दे रहे हैं । कैसे ? बिजली की धारा तारों से होती बहती है और बल्ब में प्रवेश कर उससे रोशनी देती है । उसी प्रकार जब सत्य की धारा धर्म के तार से होकर बहते हुए शांति के बल्ब में प्रवेश
करती है तो हमें प्रकाश मिलता है । सच्चा इंसान इन पांचों मानवीय गुणों का मेल होता है । वास्तव में यह पाँचों
मनुष्य के जीवन तत्व ही हैं । इसके बिना इंसान निरा शव है । यह दुर्भाग्य है कि आज के मनुष्य में इन गुणों का एकदम अभाव है ।

इस नए वर्ष में कई और पावन भावनाएं अपने में लाओ । सभी को सुखी बनाने की चेष्टा करो । धन की तलाश में न रहो । इसके बजाय प्रेम भावना को बढ़ाओ । प्रेम की भावना में बढ़ोतरी के फलस्वरूप क्रोध सरीखे दुर्गुण तुम्हारे नजदीक फटक तक न पाएंगे । तुम्हारे विचार और कर्म भले रहेंगे तो भविष्य अवश्य ही उत्तम रहेगा । तब केवल देश ही नहीं, सारा संसार ही तरक्की कर पाएगा । सारे विश्व की शांति और खुशहाली के लिए प्रभु से विनती करो । शांति की स्थापना सिर्फ मानवीय मूल्य पर आचरण करने से ही हो सकेगी ।

भगवान श्री सत्य साई बाबा 

पवित्र ग्रंथ रामायण वस्तुतः स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित वेद हैं। वेद चार हैं: ऋग्वेद,यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। रामायण में राम ऋग्वेद के प्रतीक हैं, जो यज्ञ और याग करने की अभिवृद्धि करता है। लक्ष्मण यजुर्वेद के प्रतिरूप हैं, जिसमें यज्ञ और याग करते समय गुनगुनाए जाने वाले मंत्र हैं। जब राम वन में थे, तब भरत अयोध्या छोड़कर नंदीग्राम में रहने लगे और दिन-रात चौबीसों घंटे उनके दिव्य नाम का जाप करते रहते। अतः वे सामवेद के प्रतीक हैं। शत्रुघ्न शत्रुओं का संहार करने वाले थे। उन्होंने धर्मात्मा लोगों की रक्षा की तथा अपने भाइयों की आज्ञा का पालन किया। वह अथर्ववेद के मूर्तरूप हैं। अथर्ववेद का सार दुष्टता का नाश करके पवित्र विचार और कार्य
करना है। रामायण वेद है और वेद रामायण हैं। वेद रामायण से भिन्न नहीं है। राम तथा उनके भाई एकत्व का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करते हैं। आज कलिकाल के प्रभाव से भाइयों में आपस में प्रेम नहीं है। वे एक दूसरे से लड़ते हैं और जीवन को दुखी बना देते हैं। इसके विपरीत राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न में आपस में पूर्ण एकता थी। उन्होंने आपस में कभी झगड़ा नहीं किया और एक दूसरे को सुखी बनाने का प्रयास किया। उन्होंने अपनी एकता से अन्य लोगों को भी प्रसन्न किया। बचपन में खेल खेलते समय भी उनमें से प्रत्येक दूसरे की प्रसन्नता की कामना करता था। एक बार चारों भाई खेल रहे थे तो भरत दौड़ा-दौड़ा माता कौशल्या के पास आया, उनकी गोदी में बैठा और आंसू बहाने लगा। उन्होंने उससे पूछा, "भरत तुम आंसू क्यों बहा रहे हो? क्या तुम खेल हार गए?" भरत ने उत्तर दिया "नहीं माताजी, मैं खेल नहीं हारा। वास्तव में वही मेरे रोने का कारण है। जब मैं खेल हारने ही वाला था तो राम ने खेल हारने की युक्ति कर ली और मुझे विजयी बना दिया।" उन चारों भाइयों में आपस में ऐसी एकता थी। चारों भाइयों ही में नहीं बल्कि; उनकी पत्नियों में भी बड़ी एकता और समझ थी। वे हर परिवार के लिए महान आदर्श हैं। क्या आज कोई परिवार है, जहाँ पुत्रवधुएँ सौहार्द्र में रहती हैं? क्या कोई ऐसा परिवार है, जहाँ भाई, विवाद में लिप्त हुए बिना, शांति और सामंजस्य से रहते हैं? हमें आज ऐसे आदर्श परिवार नहीं मिलते। यह कलिकाल कलह (विग्रह) काल हो गया है। ऐसे माहौल में रामायण हर परिवार के लिए प्रकाश-
स्तम्भ का कार्य करता है। परिवार के भाई-बहन और अन्य सदस्य आपस में कैसा व्यव्हार करें, रामायण में हमें इन महान आदर्शों का प्रदर्शन मिलता है।

रामायण में हमें माता और पुत्र, चारों भाइयों तथा परिवार के अन्य सदस्यों के मध्य अत्यंत मधुर, प्रिय और सामंजस्य पूर्ण संबंध मिलते हैं। यही कारण है कि परिवार के भीतर भाइयों के संबंधों के आदर्श के बारे में रामायण को उद्धृत किया जाता है। रामायण की महिमा और गौरव की कोई सीमा नहीं है। 

राम का जन्म दिवस इसलिए मनाया जाता है; ताकि हम उन आदर्शों को याद रखें, जिनकी राम ने रक्षा की थी। राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न द्वारा स्थापित आदर्शों पर हमें मनन करना है। ऋषि वशिष्ठ ने इन शब्दों में राम के दिव्य रूप का वर्णन किया है, ‘पुंसम मोहन रूपाय’। उन्होंने राम की महिमा और महानता की प्रसन्नता में कहा है: “राम, आपका सौंदर्य आपके शारीरिक रूप तक ही सीमित नहीं है। आपका असीम प्रेम तथा करुणा आपको यह रूप प्रदान करता है। आपके इस आनंदपूर्ण रूप से सभी पुरुष तथा स्त्रियां मोहित होती हैं। आप सत्-चित्-आनंद के मूर्त रूप है।” 

जहां ईश्वर है, वही उनका भक्त है। जहां ईश्वर और भक्त एक साथ होते हैं, वहां विजय निश्चित है। इसलिए सुमित्रा ने लक्ष्मण से कहा, “पुत्र ईश्वर के सहचर्य में रहना सबसे महान दौलत है। वास्तव में राम और सीता विहीन अयोध्या जंगल है। राम और सीता के साथ वन वास्तव में अयोध्या है। सीता और राम तुम्हारे माता-पिता हैं। उनकी सेवा करो और आनंदपूर्वक अपना समय व्यतीत करो।” इस प्रकार उन्होंने लक्ष्मण को राम और सीता के साथ वन में जाने के लिए तत्काल अनुमति दे दी। ईश्वर और विश्व में घनिष्ठ और अटूट संबंध है। विश्व जीवधारियों से परिपूर्ण है। प्रत्येक प्राणी राम का साकार रूप है। राम को एक विशिष्ट नाम और रूप तक सीमित मत रखो। सारे प्राणी उनके रूप है। राम का अर्थ है: वह जो प्रसन्न करता है। वह सबमें विद्यमान है। ‘ईश्वर सर्व भूतानाम्’ (ईश्वर सब प्राणियों का हृदय निवासी है)। ‘ईशावास्यम् इदम् जगत्’ (ईश्वर संपूर्ण संसार में समाया है)। संसार ईश्वर का ही रूप है। सब ईश्वर के रूप हैं। साधारण लोग राम को एक विशेष रूप तक सीमित रखते हैं। जिसके हाथ में धनुष और बाणों का तर्कश है। वास्तव में प्रत्येक मनुष्य रामस्वरूप है। इसीलिए लोग अपने बच्चों का राम, लक्ष्मण, कृष्ण, गोविंद इत्यादि नामकरण करते हैं।

रामायण को पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है। उसके महान आदर्शों को अपने जीवन में उतारना भी जरूरी है। रामायण संपूर्ण मानव जाति को आल्हादित करती है। वह समय, स्थान, जाति, धर्म की सीमाओं से परे है। रामायण के सिद्धांतों को समझने तथा आत्मसात करने के लिए ही हम श्री रामनवमी का उत्सव मनाते हैं। इस समारोह को हलवा व अन्य स्वादिष्ट व्यंजन खाने तक ही सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। राम कथा रहस्यपूर्ण, पावन और आनंदप्रद है। यह एक प्राचीन कथा मात्र नहीं है। यह शाश्वत और नित्य नूतन है। यह कल्याणकारी है। रामायण के पावन आदर्शों से अपना हृदय परिपूर्ण करो। घृणा और समस्त भेदभाव को त्यागो। शांति और सामंजस्य से जियो। जब तुम निरंतर राम का ध्यान करते हो तो तुम्हें अत्यंत हर्ष और प्रसन्नता प्राप्त होती है। रामकथा को अपने हृदय पर अंकित करो।

भगवान श्री सत्य साई बाबा 

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